सीकर (जितेंद्र सिंह शेखावत)। "कभी खाचरियावास" के "पाणी" को लेकर बुज़ुर्ग यह कहते नहीं थकते थे कि .. हमारे गांव के पाणी की ताकत दूसरी जगह के शुद्ध देशी घी से भी बढ़कर है। इसे बुद्धि को चमतकृत करने वाला जल माना जाता था। इसी जल का कमाल था कि इस गांव में जन्मे भेरोसिंह शेखावत राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री और देश के उप राष्ट्रपति बने।
वर्तमान में इस गांव के प्रताप सिंह खाचरियावास कैबिनेट मंत्री हैं। अब विडंबना यह है, कि गांव की धरती के पेट में अब एक बूंद पानी भी नहीं बचा है। खेती नष्ट हो गई और प्यास बुझाने के लिए लोगों को दूरदराज से पानी टैंकरों से खरीदना पड़ रहा है। पानी का ही कमाल रहा कि "खाया पीया" सारा हजम हो जाता और जुखाम तक नहीं लगती थी।

ताकतवर, स्वादिष्ट और बुद्धि को चमत्कृत करने वाला खाचरियावास का वो पौष्टिक "जल" न जाने अब कहां चला गया। आज यहां का हर आदमी किसी न किसी बीमारी से ग्रस्त है। पाणी के जाते ही लोगों के चेहरे की चमक गायब हो गई। अब सुबह उठते ही लोगों के कदम मंदिर के बजाय अस्पताल की तरफ बढ़ते नजर आते है।
यह खाचरियावास के पानी का ही तो कमाल है कि कुलपति, प्रोफेसर, विद्वान पंडित, मुख्यमंत्री, उपराष्ट्रपति, विधायक, मंत्री और दिग्गज अफसर और कई धन कुबेरों ने गांव का नाम रोशन किया। राजस्थान और देश की राजनीति में बड़ा दखल रखने वाले नेता और रियासत के राजा यहां जन्मे..यहां के जल देवता का की ताकत का परिणाम था। आज आसपास के गांवों में अच्छा पानी है। वहीं पूरे राजस्थान की प्यास बुझाने का दम रखने वाले इस गांव में हर जाति के नेता हर पार्टी में मौजूद है। लेकिन उनका खुद का गांव प्यासा है। सब कुछ उल्टा पुल्टा हो रहा है। लोग स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के मामले में चुप हैं।
एक ही मांग रहती है.. चिकित्सा सुविधा का विस्तार हो। मूल जड़ पानी है। कभी मृगतृष्णा रहा खारड़ा खत्म हो गया। एक समय था,.. जब यह झील और ताल तलैया लबालब रहते थे। अब यह सब यादें ही रह गई। "भाई बिन पानी सब सून" सोचा भी न था ऐसे दिन देखने पड़ेंगे। बिन पानी गांव में रहने वालों की भी हिम्मत को दाद देनी पड़ेगी। अब न रोजगार रहा और न खेती। पानी था तब चेहरों पर रौनक और रोशनी थी। खाचरियावास की हंसी मजाक और व्यंग मशहूर रहा है। अब वो सब रफूचक्कर सा होता दिखाई दे रहा है। खेती मशहूर थी। घरों के कोठे धान से भरे रहते। मंदिरों की घंटियों का नाद मन को प्रफुल्लित करता था। गरीब और अमीर खुश थे। न जानें अब क्या ग्रहण लगा है। अस्पताल के बजाय अब शुद्ध पानी लाने के लिए सोचना पड़ेगा। बाहर रहने वाले लोगों को जन्मभूमि और गांव में पानी लाने के लिए आवाज उठानी पड़ेगी। गांव की समृद्धि और पुराने दिनों को लौटाने के लिए अब पानी की ही बात करनी पड़ेगी। मूल जड़ पानी है। न जाने अब वह दिन कब आएंगे जब हमारे गांव के लोग कहेंगे कि ... मेरे गांव का पानी और दूसरी जगह के देशी घी की ताकत बराबर है।