अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: नई बेंच करेगी अंतिम फैसला, फिलहाल दर्जा बरकरार


सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के अल्पसंख्यक दर्जे को फिलहाल बरकरार रखते हुए इस मामले की गहराई से समीक्षा के लिए तीन जजों की एक नई बेंच के गठन का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ ने 4-3 के बहुमत से 1967 में आए उस ऐतिहासिक फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा देने से इनकार किया गया था। पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 30 की व्याख्या करते हुए यह कहा कि धार्मिक समुदायों को शिक्षण संस्थान स्थापित करने का अधिकार है, परंतु उसका संचालन पूरी तरह उनके अधीन नहीं हो सकता। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि अनुच्छेद 30 का प्रभाव संपूर्ण रूप से लागू होना चाहिए, ताकि संस्थान का अल्पसंख्यक स्वरूप संरक्षित रह सके।

पीठ ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा देने के संकेत, जैसे संस्थान का इतिहास, इसकी स्थापना की परिस्थितियाँ, निगमन और प्रशासनिक संरचना, विशेष रूप से विचारणीय हैं। इस मामले में अजीज बाशा बनाम भारत संघ के 1968 के निर्णय का भी उल्लेख किया गया था, जिसमें एएमयू को एक केंद्रीय विश्वविद्यालय माना गया था। बाद में 1981 में एएमयू अधिनियम में संशोधन कर इसका अल्पसंख्यक दर्जा बहाल किया गया था। 2006 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस दर्जे को चुनौती दी, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की इस समीक्षा का प्रभाव न केवल एएमयू पर बल्कि अन्य अल्पसंख्यक संस्थानों पर भी पड़ेगा, जैसे कि जामिया मिलिया इस्लामिया। यदि एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा निरस्त किया जाता है, तो एससी, एसटी और ओबीसी के लिए आरक्षण लागू हो सकता है। अनुच्छेद 19(6) के अंतर्गत अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासन में हस्तक्षेप की अनुमति है, लेकिन यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि ऐसे हस्तक्षेप से अल्पसंख्यक चरित्र पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि इस मामले की विस्तृत रूपरेखा तैयार की जाए, जिससे भविष्य में सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक स्थायी मापदंड स्थापित किया जा सके।