IAS की बेटी ने शादी के 5 दिन बाद ही पति पर 'घर जमाई' बनने का दबाव डाला, घर छोड़ा, अब 50 साल की हुई तो चाहती है पति के साथ रहे, पर सुप्रीम कोर्ट ने कही यह बड़ी बात


नई दिल्ली। एक पति पर अपना घर जमाई बनकर रखने का दबाव एक औरत की जिंदगी इस कदर तबाह कर देगा किसी ने सोचा भी नहीं होगा। IAS पिता की इस बेटी और पूरे परिवार को अब अपने इस किये पर इतना पछतावा है। महिला फिर से पति के साथ रहने की मिन्नतें कर रही है, लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत। 1995 से पत्नी पति से पीहर वालों के चक्कर मे ससुराल छोड़कर मायके चली तो गई लेकिन जब तक उसे समझ आयी वक़्त बहुत बीत चुका था। आज महिला की उम्र 50 साल और पति 55 साल है। ऐसे में अब एक दंपती से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि आप एक साथ नहीं रह सकते हैं तो एक दूसरे को छोड़ देना ही बेहतर है। पत्नी के आगे बेबस पति ने दावा किया कि 13 जुलाई, 1995 को शादी के बाद उच्च शिक्षित और संपन्न परिवार से आने वाली उनकी पत्नी ने उन पर अपनी बूढ़ी मां और बेरोजगार भाई को छोड़ अगरतला स्थित अपने घर में 'घर जमाई' बनकर रहने के लिए दबाव डाला। पत्नी के पिता तब आईएएस अधिकारी थे। पति ने मामले को शांत करने की हरसंभव कोशिश की, एडजस्टमेंट की सारी कोशिशें नाकाम हो गई, लेकिन पत्नी मानी नहीं और ससुराल छोड़कर अपने मायके चली गई। तब से दोनों अलग रह रहे हैं। उधर लगातार सुनवाई के बाद जस्टिस एमआर शाह और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने हाईकोर्ट के तलाक के आदेश के खिलाफ अपील करने वाली पत्नी से कहा कि आपको व्यवहारिक होना चाहिए, ऐसे जिंदगी या रिश्ता नहीं निभाया जाता। ऐसे पूरी जिंदगी अदालत में एक दूसरे से लड़ते हुए नहीं बिताई जा सकती। आपकी उम्र 50 साल और पति 55 साल के है। पीठ ने दंपती को स्थायी गुजारा भत्ता पर पारस्परिक रूप से निर्णय लेने के लिए कहा और दिसंबर में याचिका पर विचार करने का निर्णय लिया है। पत्नी की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि हाईकोर्ट द्वारा तलाक को मंजूरी देना गलत था। हाईकोर्ट ने इस बात की भी अनदेखी की कि समझौते का सम्मान नहीं किया गया था। वहीं पति की ओर से पेश वकील ने कहा कि वर्ष 1995 में शादी के बाद से उसका जीवन बर्बाद हो गया है। दांपत्य संबंध सिर्फ पांच-छह दिन तक चला। उसको अपने परिवार और समाज में अपमान झेलना पड़ा। उस पर गलत आरोप लगाकर बदनाम किया गया जबकि हकीकत कुछ और ही थी। उसे इस दौरान उसकी पत्नी और उसके प्रभावी हैसियत रखने वाले परिवार की ओर से मिली मानसिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी। जिंदगी खराब कर दी। उसके परिवार को अपमान सहना पड़ा वो अलग। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा क्रूरता और शादी के अपरिवर्तनीय टूट के आधार पर तलाक की अनुमति देना बिल्कुल सही था। इतना ही नहीं वकील ने कहा कि पति पत्नी के साथ नहीं रहना चाहता और वह स्थायी गुजारा भत्ता देने को तैयार है। यानी किसी भी सूरत में अब इस रिश्ते में कोई गुंजाइश नहीं बची, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी काफी अहम है।