CJI डीवाई चंद्रचूड़ के सेवानिवृत्ति के बाद जस्टिस संजीव खन्ना भारत के 51वें चीफ जस्टिस का पद संभालेंगे। 11 नवंबर को CJI के रूप में शपथ लेने वाले जस्टिस खन्ना छह महीने तक इस पद पर रहेंगे। उनके पिता देवराज खन्ना दिल्ली हाईकोर्ट के जज रहे थे, और उनके चाचा, जस्टिस हंसराज खन्ना, सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक जजों में से थे जिन्होंने इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी सरकार के फैसलों का विरोध किया था। इस पारिवारिक विरासत ने संजीव खन्ना के कानूनी दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया है।
1983 में दिल्ली यूनिवर्सिटी से एलएलबी करने के बाद जस्टिस खन्ना ने तीस हजारी कोर्ट से वकालत शुरू की और धीरे-धीरे इनकम टैक्स व अन्य दीवानी मामलों के सरकारी वकील बने। 2005 में दिल्ली हाईकोर्ट में जज नियुक्त होने के बाद 2019 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया गया। हालांकि उनकी नियुक्ति पर विवाद भी हुआ, जब तत्कालीन CJI रंजन गोगोई ने वरिष्ठता क्रम में खन्ना के नीचे के कई जजों को छोड़कर उन्हें सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त किया। विरोध के बावजूद, तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने जस्टिस खन्ना की नियुक्ति को मंजूरी दी, और वह सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए।
अपने छह साल के सुप्रीम कोर्ट कार्यकाल में जस्टिस खन्ना ने 450 मामलों की बेंचों का हिस्सा बनकर 115 से अधिक फैसले लिखे हैं। उन्होंने हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जमानत देने के साथ-साथ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे का समर्थन करने जैसे महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। इसके अलावा, उन्होंने अनुच्छेद 370, इलेक्टोरल बॉन्ड, और विभिन्न संवैधानिक मामलों पर भी अपने महत्वपूर्ण विचार रखे हैं।
सीजेआई के तौर पर उनका कार्यकाल केवल छह महीने का होगा, जिसमें उन्हें कई महत्वपूर्ण मामलों पर निर्णय देना है। इनमें मैरिटल रेप की वैधता, चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया, बिहार जातिगत जनगणना की वैधता, सबरीमाला केस की समीक्षा और राजद्रोह कानून की संवैधानिकता जैसे बड़े मामले शामिल हैं।
जस्टिस खन्ना का CJI बनने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम प्रणाली के तहत हुआ, जो वरिष्ठता के आधार पर जजों की नियुक्ति करती है। 1999 में तैयार किया गया MoP (मेमोरेंडम ऑफ प्रोसीजर) इस प्रक्रिया को निर्देशित करता है, हालांकि इंदिरा गांधी के कार्यकाल में दो बार इस परंपरा का उल्लंघन भी हुआ है।
जस्टिस खन्ना की कानूनी विरासत और आने वाले प्रमुख मामलों पर उनके विचार भारतीय न्यायपालिका में एक नई दिशा तय कर सकते हैं।