IAS शिखर अग्रवाल प्रकरण: कुर्सी का रुतबा स्थायी नहीं होता, लेकिन फैसलों और व्यवहार का हिसाब वक्त जरूर मांगता है


कभी सिस्टम में अपनी तेज रफ्तार और फैसलों के लिए चर्चित रहे शिखर अग्रवाल अब खुद सवालों के घेरे में। करीबी और पूर्व सहयोगियों के बीच उनके कथित व्यवहार की भी चर्चा, 40 विला प्रकरण में ACB की विस्तृत जांच को सरकार की मंजूरी।

जयपुर (आलोक शर्मा) । कहते हैं कि कुर्सी कितनी भी बड़ी हो, हमेशा नहीं रहती और वक्त बदलते देर नहीं लगती। व्यवहार बताता है बेरूखी कितनी है, अपनापन कितना है, और उसी हिसाब से दिलों में जगह बनती है। राजस्थान के IAS अधिकारी शिखर अग्रवाल का मामला इन दिनों इसी कहावत की याद दिला रहा है। कभी अपनी तेज कार्यशैली, नतीजे देने की क्षमता और आक्रामक प्रशासनिक अंदाज के लिए पहचाने जाने वाले अग्रवाल आज 40 विला खरीद विवाद को लेकर चौतरफा सवालों से घिरे हैं। कुर्सी का रुतबा या व्यवहार का घमंड? 40 विला विवाद में घिरे IAS शिखर अग्रवाल की अब ACB की जांच से मुश्किलें बढती दिखाई दे रही है। बताया जा रहा है कि यह वक्त का पहिया है इसलिए कभी एसीबी में जो अधिकारी उनसे दोस्ताना संबंध निभाने को बेताब नजर आते थे अब वही पूछताछ के लिए लालायित हैं। ऐसा नहीं है कि शिखर अग्रवाल के अलावा और कोई आईएएस या आईपीएस अधिकारी ऐसा नहीं जिसके पास इनती सम्पति ना हो। कई ऐसे प्रशासनिक अधिकारी हैं जो शिखर से भी ऊपर हैं। लेकिन सिर्फ शिखर का व्यवहार उन्हें फर्श पर लाता नजर आ रहा है। हालांकि शिखर अग्रवाल इस प्रकरण के उजागर होने के वक्त विदेश में थे। ऐसे में वो जब जयपुर लौटेंगे तो वास्तविक स्थिति क्लियर होगी। लेकिन रायता बहुत फेल चुका है। उनके ही साथी आईएएस अधिकारी उनके मजे लेते नजर आ रहे हैं। लोगों तक कंटेंट का एंगल पहुंचा रहा हैं। 
कहते हैं क्रोध हमारी सहनशीलता को जला देता है और सहनशीलता न होने से हम सही राह भूल जाते हैं। शायद शिखर अग्रवाल इस बात को नहीं समझ पाए। लेकिन शिखर अग्रवाल के इस प्रकरण से अन्य अधिकारियों को भी सीखने की जरूरत है। एक ऐसा अधिकारी जो अपने तीस साल के करीयर में हमेशा टॉप परफोर्मर रहा, कभी एपीओ नहीं हुआ लेकिन जैसे ही मौका आया उसके खिलाफ मानो पूरा जमाना खडा हो गया। क्या मीडिया, क्या नेता, क्या सरकार, क्या ब्यूरोक्रेसी। 
उनके साथ काम कर चुके कुछ अधिकारियों और करीबी लोगों के बीच चर्चा है कि उनकी कार्यशैली जितनी तेज थी, व्यवहार उतना ही तल्ख माना जाता था। आरोप है कि वे कई बार वरिष्ठों, मंत्रियों और जनप्रतिनिधियों के सामने भी अपनी बात बेहद बेबाक और सख्त अंदाज में रखते थे। मुख्यमंत्री कार्यालय में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के दौरान भी उनके कथित व्यवहार को लेकर असहजता की चर्चाएं रही हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

अब परिस्थितियां पूरी तरह बदलती दिखाई दे रही हैं। 40 विला खरीद मामले में राजस्थान सरकार ने ACB को विस्तृत जांच की मंजूरी दे दी है। पद के कथित दुरुपयोग, निजी कंपनी गोयल फैशंस को लाभ पहुंचाने और परिजनों के नाम संपत्तियां खरीदने जैसे आरोपों की पड़ताल होगी।

मामला यहीं तक सीमित नहीं है। राजनीतिक गलियारों में CBI और ED जांच की मांग उठ रही है। नेता खुलकर बयान दे रहे हैं और मीडिया में भी प्रकरण लगातार सुर्खियों में है। चर्चा यह भी है कि उद्योग विभाग में उनके कार्यकाल के दौरान लिए गए फैसलों की भी बारीकी से समीक्षा की जा सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सत्ता के गलियारों में व्यवहार और रिश्तों की अहमियत को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है?

कुर्सी का रुतबा स्थायी नहीं होता, लेकिन फैसलों और व्यवहार का हिसाब वक्त जरूर मांगता है।