जयपुर (सुभद्र पापड़ीवाल)। राजस्थान कांग्रेस की राजनीति में इस वक्त जो चल रहा है वो पार्टी के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता। हालांकि कुछ जानकार इसे कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी की ताजपोशी की राहत साफ करने के लिए स्क्रिप्टेड प्ले भी बता रहे हैं। पर अब सच चाहे कुछ भी हो, इस ऐपिसोड से सीएम अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट दोनों को ही नुकसान होता नजर आ रहा है। गांधी परिवार के प्रति अशोक गहलोत की विश्वसनीयता पर जहां सवाल उठा है वहीं अब पायलट के सीएम बनने की राह भी आसान नहीं लग रही।
ऐसे में एक पुरानी कहानी चरितार्थ होती नजर आ रही है कि बिल्लियों की लड़ाई में बंदर के मजे। ऐसी कहानियां बचपन से ही सुनते आए हैं। ऐसी सभी कहानियों में अंत में एक सनद होती है, शिक्षा और संदेश भी होता है। ऐसा ही कुछ इस वक्त कांग्रेस की सियासत में हो रहा है। माना जा रहा है कि दोनों दिग्गज नेताओं की वर्चस्व की जंग में अब किसी ऐसे नेता का भाग्य खुल सकता है जिसकी किसी को उम्मीद भी नहीं थी। चाहे बात प्रदेश से जुडे प्रमुख पद की हो या अखिल भारतीय कांग्रेस में किसी पद की। इस बीच सवाल उठता है कि आखिर यह सब क्यों हुआ और सबके बाद अब कौन से रास्ते बचते हैं।
1. गहलोत ने मानेसर प्रकरण में जीत दर्ज की। पार्टी की सीमाओं से भी परे जाकर ही सही लेकिन अपनी दक्षता का लोहा मनवाया।
2. उस समय सचिन पायलट पार्टी में अपनी भूमिका और प्रासंगिकता को लेकर लगभग शून्य की स्थिति में धकेल दिए गए।
3. अशोक गहलोत के अनुभव ने पार्टी के भीतर मजबूत पकड़ बनाने में मदद की जबकि सचिन की चिरपरिचित एरोगेंट शैली ने उनको जमीनी स्तर पर गहरी जड़ें बनाने से रोके रखा।
4. केंद्रीय नेतृत्व और निर्गुट कार्यकर्ता सदैव से इस बात पर सहमत रहे हैं कि सचिन को वास्तविक अधिकारों से वंचित किया गया है। ये लोग प्रतिपक्ष के दिनों की उनकी मेहनत की अनदेखी भी नहीं करना चाहते थे, विशेष रूप से राहुल गांधी।
5. भारत जोड़ो यात्रा के समय राहुल के साथ सचिन की कैमिस्ट्री सभी ने देखी। यह पुराने क्षत्रपों को रास नहीं आई। इनमें सबसे अधिक असहजता अशोक गहलोत में देखने को मिली। फिर उदयपुर मंथन के एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत ने गहलोत को संदेह से भर दिया था और वही हुआ भी। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा शुरू होते ही गहलोत समझ चुके थे कि पटकथा किस तरह लिखी गई है। वे आशंकित तो थे लेकिन पर्यवेक्षकों की कुछ नादानियों ने आलाकमान की फलियां बिखेर दी।
6. गहलोत राष्ट्रीय अध्यक्ष बनकर पूरी मेहनत कर पार्टी को निकट भविष्य में कोई ठोस परिणाम लाकर नहीं दे सकते हैं, वे भली भांति जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि अप्रिय परिणामों का ठीकरा उन पर फोड़ा जाएगा। वे गांधी परिवार के कितने भी वफादार हों, गांधी परिवार से नहीं हैं। दूसरा यह कि यदि सचिन को राजस्थान की कमान दी गई तो गहलोत आगामी विधानसभा चुनावों में अपने चहेतों को उपकृत भी नहीं कर सकेंगे। तीसरा यह कि गहलोत की उम्र उनके विरुद्ध दौड़ रही है।
7. ऐसे में गहलोत ने सीधे ही आलाकमान को चुनौती दे डाली। कोई विकल्प शेष नहीं था। पर्यवेक्षक आलाकमान की आज्ञा और इच्छा पर ही अमल करते हैं। यह बात उनसे अधिक कोई नहीं जानता। चाहे मदेरणा जी वाला चुनाव हो, बी.डी. कल्ला, सी.पी. जोशी वाला चुनाव हो या सचिन पायलट वाला चुनाव हो। सभी में गहलोत ने एक लाइन के प्रस्ताव की करामात देखी हुई है।
8. ऐसे में गहलोत सीधे इसलिए भिड़ गए कि उनके समर्थक दोनों हाथों में लड्डू की पैरवी कर रहे थे और उनके समर्थकों को आशंका थी कि आलाकमान पूर्ण उपवास कराने की सोच रहा था। तो उन्होंने अंतिम उपाय काम में ले लिया।
9. वे बड़ी भूल इसलिए कर बैठे कि गांधी परिवार ने पिछले कुछ सालों में आठ पूर्व मुख्यमंत्री खोए हैं, धुरंधर नेता खोए हैं और एक बड़ी नाराज कांग्रेस को भी सहन कर रहे हैं। लेकिन झुके नहीं। गहलोत जानते हैं कि झुकने पर नेतृत्व की मौत है।
10. अब या तो आलाकमान इनकी सभी मांगों पर सहमत हो कर अपनी साख धूमिल कर लेगा, या गहलोत को पूरी तरह बाहर कर देगा तो अधिकांश कार्यकर्ता और विधायक उगते सूरज के तले चले जाएंगे लेकिन सरकार संकट में आएगी या धारीवाल, महेश जोशी अथवा प्रताप सिंह अथवा अजय माकन या इनमें से कुछ या सभी पर इस घटनाक्रम का ठीकरा फोड़ कर कुर्बानी देगा और गली निकाल लेगा।
बहरहाल अब जो भी हो पर कांग्रेस को राजस्थान में अब अच्छा विकल्प बनाने में बहुत परिश्रम करना अवश्यंभावी है। गहलोत और पायलट की लड़ाई में कांग्रेस को नुकसान के अलावा कुछ नहीं मिलने वाला। गहलोत इस वक्त भी बेहद मंझे हुए राजनेता और नेतृत्वकर्ता हैं, लेकिन उनकी जल्दबाजी में की गई एक गल्ती ने सारा खेल पलट कर रख दिया। आलाकमान को भले ही अब सफाई दी जा रही हो लेकिन वहां यह जरूर पता है कि राजस्थान में विधायक दल की बैठक के समानांतर एक बैठक रखी जाए और राजस्थान के मुख्यमंत्री की मंशा या अनुमति के बिना ऐसा हो जाए, ऐसा कतई संभव नहीं हो सकता। और यदि ऐसा है कि गहलोत की नॉलेज में ऐसा नहीं था तो फिर गहलोत के नेतृत्व पर भी सवाल उठना लाजमी है कि इतना बड़ा घटनाक्रम हो गया, और उनकी पार्टी के विधायक क्या कर रहे हैं ये ही एक सीएम को पता ना हो तो यह वक्त चिंता का है।