न्यूयॉर्क (ऋचा मिश्रा, वर्ल्ड डेस्क). कोरोना संकटकाल में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार कोरोना के कहर को पर्ल हार्बर हमले से भी घातक आघात बता रहे हैं. अपने कई संबोधनों में ट्रंप इसका जिक्र कर चुके हैं. पर सबके मन में सवाल है कि ऐसा क्या हुआ था पर्ल हार्बर में जिसका जिक्र आए दिन रह-रह कर ट्रंप कर रहे हैं. आखिर ऐसा क्या हुआ था कि जिसको दुनिया की महाशक्ति आज भी भुला नहीं पाई है.
दरअसल बात वर्ष 1941 की है. इस वक्त से पहले तक जापान दुनिया के चीन और रूस जैसे बड़े देशों को युद्ध में हरा चुका था. इम्पीरियल आर्मी ऑफ जापान इस तरह से अति आत्मविश्वासी हो गई थी कि जापान बहुत छोटा देश था लेकिन इस आर्मी का साहस, अति आत्विश्वास सातवें आसमान पर था जिसने अमेरिका की भी चिंताएं बढा दी थी.
चीन में जापान के खौफ के कारण हस्तक्षेप बहुत ज्यादा बढने लगा था, इतना की अमेरिका की चिंताएं काफी बढ गई और उसने जापान पर कई आर्थिक और अन्य प्रतिबंध लगा दिए. जहां से जापान अमेरिका से खफा रहने लगा. इतना ही नहीं इस व्यवहार के बाद जापान ने अमेरिका को सबक सीखाने की सोची, उस वक्त दुनिया का कोई देश अमेरिका पर हमले की सोच भी नहीं सकता था लेकिन जापान उसे सबक सीखाने पर आमादा हो गया. इतना ही नहीं जापान ने ठान ली कि अमेरिकी प्रशान्त टुकड़ी जापान के भावी योजनाओं में दखल न दे पाए. जापान दक्षिण पूर्वी एशिया में यूके, नीदरलैण्ड्स तथा यूएस के अधिकृत क्षेत्रों पर सैनिक कार्यवाही करने की योजना बना रहा था. जापान को ऐसे में अमरीका और ब्रिटेन का याराना भी पसंद नहीं था. इसी बीच जापान ने अमेरिका को सबक सीखाने के लिए हमले की रणनीति पर काम शुरू किया, जिसके कई रिहर्सल भी किए गए.
अमरीका के प्रसिद्ध बंदरगाह एवं नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर को एक सुरक्षात्मक रणनीति के तहत नष्ट करने का प्लान बनाया. यह उस वक्त यह अमरीका का बेहद ही महत्वपूर्ण नौसैनिक अड्डा था. कई महीनों की रणनीति के बाद आखिरकार वो दिन आ ही गया. जापान की रणनीति के तहत संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के इतिहास का वो अनिष्ट दिन आ ही गया. जब दूसरे विश्व युद्ध ने उसके दरवाज़े पर दस्तक दी थी.
7, दिसम्बर 1941 के उस दिन जापान ने अमेरिका के हवाई द्वीप स्थित नौसेना के बंदरगाह ‘पर्ल हार्बर’ की तरफ कूच कर दिया. तीन जापानी कमांडर्स के नेतृत्व में जापानी नौसेना के छः विमान वाहक जहाज़ के साथ, दर्जन से अधिक जंगी जहाज़, 23 बड़ी और 5 छोटी पनडुब्बियों के एक बेड़े ने प्रशांत महासागर में स्थित अग्रणी अमरीकी नौसनिक ठिकाने पर्ल हार्बर पर अचानक धावा बोल दिया. देखते ही देखते पर्ल हार्बर का आकाश उस दिन सुबह करीब 4 सौ से अधिक जापानी विमानों से ढक गया.
विमानों की गर्जना के साथ बम और गोलियों की बरसात होने लगी. आक्रमण की शुरुआत हवाई हमले से हुई, 6 विमान वाहक पोत से उड़ान भर जापान के लड़ाकू विमानों ने दो चरणों में आक्रमण किया. स्थानीय समय अनुसार सुबह 7:48 पर जापानी हवाई हमला शुरू हुआ. पहले अमेरिका के विध्वंसक जहाज़ और लड़ाकू विमानों को निशाना बनाया गया, फिर युद्धपोतों को. अमरीकी सैनिक हमले से बेख़बर थे और जब तक मोर्चा संभालते उन्हें बड़ा नुक़सान हो चुका था. हर तरफ तबाही का मंजर और हजारों लाशें बिछ गईं.
हमला इतना जबरदस्त था कि अमेरिका के 2,335 सैनिक मारे गए, 1,400 से अधिक घायल हुए और एक हजार से ज्यादा लापता हो गए. नौसेना के बेड़े को जबरदस्त क्षति हुई. हमले के वक्त पर्ल हार्बर पर अमेरिका के 8 युद्धपोत और 4 पनडुब्बियों सहित क़रीब 50 जंगी जहाज़ मौजूद थे. इतने ही अन्य जहाज़ और 390 के क़रीब लड़ाकू विमान भी पर्ल हार्बर पर खड़े थे. जापानी हमले ने सबकुछ बर्बाद कर दिया.
जापान ने एक घंटे और 15 मिनट तक 'पर्ल हार्बर' पर जमकर बमबारी की थी. हालांकि इस हमले में सौ से ज्यादा जापानी सैनिक भी मारे गए थे.

ये हमला अमरीका के लिए बेहद चौंकाने वाला और एक बडे सदमे जैसा था क्योंकि उस दौरान वॉशिंगटन में जापानी प्रतिनिधियों की अमरीकी विदेश मंत्री कॉर्डेल के साथ जापान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को ख़त्म करने को लेकर बातचीत चल ही रही थी. लेकिन दूसरी तरफ जापान ने हमला कर दिया. सदमा इसलिए कि दुनिया के एक छोटे से देश ने दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति पर हमला किया था.
इसके बाद तुरंत अमरीका ने सीधे तौर पर दूसरे विश्व युद्ध में शामिल होने की घोषणा कर दी और मित्र राष्ट्रों की ओर से मोर्चा संभाला.
अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने उसी दिन युद्ध की घोषणा करते हुए कहा था कि 'यह दिन अमेरिका के इतिहास में एक बुरे दिन जैसे जाना जाएगा.'
इससे पहले तक अमेरिका दूसरे विश्व युद्ध में शामिल लोगों को हथियार और सैन्य सामान बेचने में लगा था. यह अमेरिका अप्रत्याशित हमला था और इसी वजह से अधिक भयावह भी. आज भी अमेरिका में आकस्मिक आपदा जैसे इसका स्मरण किया जाता है.
6 अगस्त 1945 और 9 अगस्त 1945 को जापान के हीरोशिमा और नागासाकी पर हुआ हमला इस हमले की परणीति था, जहां दुनिया के इतिहास में पहली और आखरी बार परमाणु बम का इस्तेमाल किया गया.