महालक्ष्मी माता तो वहां विराजी हैं जहां कभी सोने-चांदी के सिक्के ढलते थे


जयपुर (जितेन्द्र सिंह शेखावत). अष्ट सिद्धि और नव निधि के आधार पर बसें ढूंढाड़ में जयपुर रियासत की महालक्ष्मी जी का सबसे पुराना मन्दिर चांदी की टकसाल में मौजूद हैं।

पुरानी राजधानी आमेर की टकसाल बंद होने के बाद सवाई जयसिंह ने जयपुर के सिरह डयोड़ी बाजार में रामप्रकाश सिनेमा के सामने चांदी सोने की मुद्रा ढालने के लिए टकसाल की इमारत बनवाई थी। इस टकसाल में सिक्के ढालने का काम शुरू किया उससे पहले प्रकांड विद्वानों ने धन की देवी महालक्ष्मी जी का अनुष्ठान किया था।

रियासत काल में माता महालक्ष्मी के इस मन्दिर में सुबह शाम आरती और विधि विधान से पूजा के बाद ही चांदी के सिक्के और सोने की मोहरे बनाने का का काम शुरू किया जाता था। इस टकसाल में मां लक्ष्मी के अलावा धन के रक्षक भैंरों जी महाराज की भी पूजा होती। टकसाल की इमारत के चारों कोनों में भोमिया जी को विराजमान किया गया है।

कहते हैं कि रियासत काल में यहां के मंदिर में अष्ट धातु से निर्मित महालक्ष्मी की मूर्ति थी। तांबे के सिक्कों के लिए खेतड़ी से तांबा और चीन, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, इंग्लैंड आदि देशों से सोना और चांदी आती थी। आषाढी दशहरा पर टकसाल परिसर में धार्मिक अनुष्ठान होता जिसमें महाराजा सोने के हल से मोती की बुवाई कर राज्य में अच्छी खेती होने की कामना करते थे। यहां सोना और चांदी होने की वजह से टकसाल में संगीनों का पहरा रहता और आम आदमी का प्रवेश वर्जित था। मालगाड़ी से आने वाली सोने चांदी की सिल्लियों को कड़े पहरे में रेलवे स्टेशन से टकसाल में लाया जाता था। तारकशी विभाग सोने व चांदी पर शुद्धता की छाप लगाता। राम राज्य की परंपरा के अनुरूप सिक्कों पर कचनार के झाड़ का चिन्ह लगाने की वजह से यहां के सिक्कों का नाम झाड़शाही पड़ा। टकसाल में बना झाड़शाही रुपया शुद्धता के लिए पूरे हिंदुस्तान में प्रसिद्ध रहा। शुद्ध सोने की मोहर का वजन 167 .8 ग्रेन था। सन 1875 में जयपुर का रुपया वजन में कलदार से 8 ग्रेन कम होने पर भी उसका मूल्य अंग्रेजी कलदार से एक आना अधिक रहता था।

स्वर्ण मोहरे भी शुद्धता के लिए भारत में प्रसिद्ध रही। टकसाल में सिक्कों का निर्माण कराने के लिए मनोहर लाल पन्नीगर सहित स्वर्णकारों को दिल्ली से लाकर बसाया गया। उनके वंशज कमलेश सोनी आदि स्वर्णकार आज भी टकसाल परिसर में आभूषण बनाते हैं।