नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान पत्नी की ओर से पति से हर महीने 1,500 डॉलर (करीब 1.41 लाख रुपये) पॉकेट मनी मांगने का मुद्दा सामने आया। इस मांग पर सुनवाई कर रहे जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन ने हल्के-फुल्के अंदाज में ऐसी टिप्पणी की, जिसने अदालत का माहौल कुछ देर के लिए दिलचस्प बना दिया।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, 4 नवंबर को हुई सुनवाई के दौरान महिला की ओर से इतनी बड़ी रकम की मांग रखी गई थी। इस पर जजों ने सवाल उठाया कि जब पति अपनी पत्नी की सभी जरूरतों और खर्चों का ध्यान रख रहा है, तो अलग से इतनी बड़ी रकम पॉकेट मनी के रूप में देने की मांग क्यों की जा रही है?
सुनवाई के दौरान जज ने अपनी सैलरी का उदाहरण देते हुए महिला के वकील से मजाकिया लहजे में कहा कि हमारी सैलरी तो करीब 3 लाख रुपये है, 15 हजार डॉलर नहीं। उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि वकीलों को महिलाओं को इस तरह के शानदार सुझाव देने से बचना चाहिए। जजों की इस टिप्पणी ने वैवाहिक विवादों में आर्थिक मांगों और पति-पत्नी के बीच वित्तीय अपेक्षाओं को लेकर एक दिलचस्प बहस छेड़ दी है।
इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट की एक अन्य वैवाहिक मामले में विदेशी अदालत से मिले तलाक के आदेश की कानूनी वैधता को लेकर भी अहम टिप्पणी सामने आई।
अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी विदेशी अदालत द्वारा दिया गया तलाक का आदेश भारत में स्वतः मान्य नहीं हो जाता। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं है कि पति-पत्नी के रिश्ते में सुधार की कोई संभावना नहीं बची है। विदेशी अदालत के फैसले को भारतीय कानून के प्रावधानों और उसकी कानूनी वैधता की कसौटी पर परखा जाना जरूरी है।
एक अन्य मामले में पति की याचिका खारिज करते हुए अदालत ने द्विविवाह के आरोपों की जांच से जुड़े महत्वपूर्ण पहलुओं पर भी विचार किया। अदालत के अनुसार, ऐसे मामलों में केवल दूसरी शादी कहां हुई, यह देखना पर्याप्त नहीं है। पहली शादी की कानूनी स्थिति और उसके वैध रूप से जारी रहने जैसे तथ्यों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
भारत में विवाह और उससे जुड़े विवादों के निपटारे के लिए अलग-अलग कानूनी प्रावधान मौजूद हैं। इनमें तलाक, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, बच्चों की कस्टडी, संपत्ति विवाद और दूसरी शादी से संबंधित मामले शामिल हैं।
पति और पत्नी दोनों को कानून के तहत अधिकार और कानूनी संरक्षण प्राप्त हैं। विवाद की प्रकृति के अनुसार संबंधित पक्ष फैमिली कोर्ट, मजिस्ट्रेट, पुलिस या विधिक सेवा प्राधिकरण की मदद ले सकते हैं।
विवाह पर लागू होने वाला कानून संबंधित पक्षों के धर्म और विवाह की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदायों के विवाह संबंधी मामलों में सामान्यतः हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधान लागू होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों ने एक बार फिर वैवाहिक रिश्तों में आर्थिक जिम्मेदारियों, कानूनी अधिकारों और विदेशी अदालतों के फैसलों की भारत में मान्यता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को चर्चा में ला दिया है।