रामपुर रत्नाकर (बिहार). एक तरफ चमगादड़ दुनिया के सबसे बड़े खलनायक बन गए हैं, हर कोई इस नाम से ही सहम जाता है, तो दूसरी तरफ दुनिया का एक गांव ऐसा भी है जहां इनकी पूजा की जा रही है, चमगादड शत्रु नहीं मित्र हैं. इतना ही नहीं चमगादड़ों को दैवीय अंश मानते हुए दिन रात इनकी पूजा करते हैं. यह गांव भारत के बिहार राज्य में मौजूद है.
बिहार के रामपुर रत्नाकर गांव के लोग इन चमगादड़ों के प्रति इनती आस्था रखते हैं कि किसकी मजाल की उन चमगादड़ों के ऊपर आंख उठा कर देख भी ले. इस गांव में सैकड़ों एकड़ में कई साल पहले चमगादड़ों को बसाया गया और वहां के लोग आज भी इसे दैवीय रूप मानकर इसका संरक्षण कर रहे हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि कोई भी विपदा हो हर वक्त ये चमगादड़ इन्हें पूर्व आभास कराते हैं. चाहे फिर कोसी की बाढ़ हो या 1934 का प्रलयंकारी भूकंप, हर बार इन चमगादड़ों ने आने वाली विपदा का आभास कराया है.
गांव के लोगों की मान्यता है कि चमगादड की पूजा करने से ना केवल महामारी दूर भागती है बल्कि कभी धन-धान्य की कमी भी नहीं आती. यहां कोई भी शुभ कार्य हो, सबसे पहले लोग चमगादड़ों की पूजा करते हैं, उन्हे भोग लगाते हैं, मंगलकामना करते हैं इसके बाद ही शुभ कार्यों की शुरुआत करते हैं. ताकि बिना विघ्न के कार्य सम्पन्न हो जाएं, और कार्य फलदायी रहे.
हालांकि यह चमगादड़ लोगों की बसावट के पास अपना डेरा ना जमाकर गांव से थोड़े दूर तालाब के किनारे पीपल के पेड़ों के आसपास ही रहते हैं. रात में गांव के अलावा कोई बाहर व्यक्ति प्रवेश करता है तो यह चमगादड़ अपनी आवाज से पूरे गांव को सचेत करते हैं.
कई सालों से चमगादड़ों की पूजा करने, उनके संरक्षण करने के साथ चमगादड़ों द्वारा गांव की रक्षा करने का यह दौर चल रहा है.
कोरोना संकट के इस काल में भी स्थानीय लोगों का मानना है कि दुनिया के लिए चमगादड़ कोरोना का खतरा हो सकते हैं लेकिन उनके गांव के लिए यह वरदान या किसी देवदूत से कम नहीं हैं.
हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि चमगादड़ कब से यहां आकर रह रहे हैं. पर एक पौराणिक कहानी के मुताबिक मध्यकाल में एक बार वैशाली में महामारी फैली थी, तब ये चमगादड़ कहीं से उड़कर यहां आ गए और फिर हमेशा के लिए यहीं बस गए. तब से लेकर आज तक यहां कोई महामारी नहीं फैली. बस फिर क्या था इस गांव के लिए यह चमगादड़ अब देवता के रूप में मान्यता ले चुके हैं.